पंचतन्त्रकथा : सिंहः चतुरः शशः च
शेर और चतुर खरगोश | संस्कृत-कथा (सानुवाद)
📌 कथा-परिचयः: यह कथा पंचतंत्र के 'मित्रभेद' तंत्र से संकलित है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि बुद्धि और सूझ-बूझ के बल पर विशाल शारीरिक शक्ति और क्रूरता को भी पराजित किया जा सकता है।
प्रथमः भागः (पहला दृश्य)
एकस्मिन् वने भासुरकः नाम अतिबलवान् क्रूरः च सिंहः वसति स्म। सः प्रतिदिनं बहून् पशुन् मारयति स्म। अनेन वने सर्वे पशवः भीताः आसन्।
हिन्दी अनुवादः
एक जंगल में 'भासुरक' नाम का एक बहुत बलवान और क्रूर शेर रहता था। वह रोज बहुत से जानवरों को मार डालता था। इससे जंगल के सभी जानवर भयभीत थे।
द्वितीयः भागः (दूसरा दृश्य)
अतः सर्वे पशवः मिलित्वा सिंहस्य समीपम् अगच्छन् अवदन् च— "मृगेन्द्र! त्वं प्रतिदिनं बहून् पशुन् मा मारय। वयं क्रमेण प्रतिदिनम् एकैकं पशुं तव भोजनाय प्रेषयिष्यामः।" सिंहः तद् वचनं स्वीकृतवान्।
हिन्दी अनुवादः
इसलिए सभी जानवरों ने मिलकर शेर के पास जाकर कहा— "हे मृगराज! आप रोज बहुत से जानवरों को मत मारिए। हम बारी-बारी से रोज एक-एक जानवर आपके भोजन के लिए भेज दिया करेंगे।" शेर ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली।
तृतीयः भागः (तीसरा दृश्य)
एकदा एकस्य चतुरस्य शशकस्य वारः समायातः। शशकः मन्दं मन्दं गत्वा विलम्बेन सिंहस्य समीपम् अगच्छत्। बुभुक्षितः सिंहः अतीव क्रुद्धः अभवत् अवदत् च— "त्वं लघुः असि, विलम्बेन च आगतः। अतः अहं त्वां हत्वा सर्वान् पशुन् मारयिष्यामि।"
हिन्दी अनुवादः
एक बार एक चतुर खरगोश की बारी आई। खरगोश जान-बूझकर धीरे-धीरे चलकर काफी देर से शेर के पास पहुँचा। भूखा शेर बहुत क्रोधित हुआ और बोला— "तुम छोटे भी हो और देर से आए हो। इसलिए मैं तुम्हें खाकर बाकी सब जानवरों को भी मार डालूँगा।"
चतुर्थः भागः (चौथा दृश्य)
शशकः विनयेन अवदत्— "स्वामिन्! मम दोषः नास्ति। मार्गे अपरः सिंहः मां दृष्ट्वा अवदत् यत् 'अहमेव अस्य वनस्य राजा।' अहं तं कथञ्चित् वञ्चयित्वा अत्र आगतः अस्मि।"
हिन्दी अनुवादः
खरगोश ने नम्रता से कहा— "हे स्वामी! मेरा कोई दोष नहीं है। रास्ते में दूसरे शेर ने मुझे रोककर कहा कि 'मैं ही इस जंगल का राजा हूँ।' मैं उसे किसी तरह धोखा देकर यहाँ आया हूँ।"
पञ्चमः भागः (पाँचवाँ दृश्य)
एतत् श्रुत्वा कुपितः भासुरकः अवदत्— "कुत्र अस्ति सः अपरः सिंहः? मां दर्शय।" शशकः सिंहं गम्भीरं कूपं प्रति अनयत् अवदत् च— "पश्यतु स्वामी, अत्र कूपे सः वसति।" सिंहः कूपस्य जले स्वस्य प्रतिबिम्बं दृष्ट्वा अपरं सिंहं मत्वा गर्जनं कृतवान्। कूपे प्रतिध्वनिः अभवत्। ततः क्रुद्धः सिंहः तं हन्तुं कूपे अकूर्दत्, मृतः च। एवं बुद्धिमता शशकेन सर्वेषां प्राणिनां रक्षा अभवत्।
हिन्दी अनुवादः
यह सुनकर क्रोधित भासुरक बोला— "कहाँ है वह दूसरा शेर? मुझे दिखाओ।" खरगोश शेर को एक गहरे कुएँ के पास ले गया और बोला— "देखिए स्वामी, वह इस कुएँ में रहता है।" शेर ने कुएँ के पानी में अपनी ही परछाई देखी और उसे दूसरा शेर मानकर दहाड़ा। कुएँ से प्रतिध्वनि (गूँज) हुई। तब क्रोधित शेर उसे मारने के लिए कुएँ में कूद पड़ा और मर गया। इस प्रकार बुद्धिमान खरगोश ने सभी प्राणियों की रक्षा की।
📚 कठिन-शब्दार्थाः (Vocabulary)
| संस्कृत शब्दः | हिन्दी अर्थः | English Meaning |
|---|---|---|
| मृगेन्द्रः / सिंहः | शेर / पशुओं का राजा | Lion / King of beasts |
| भीताः | डरे हुए / भयभीत | Frightened / Scared |
| शशकः | खरगोश | Rabbit / Hare |
| वारः | बारी / क्रम | Turn |
| विलम्बेन | देरी से | Late / With delay |
| वञ्चयित्वा | धोखा देकर / ठग कर | By tricking / deceiving |
| प्रतिबिम्बम् | परछाई / छाया | Reflection |
| प्रतिध्वनिः | गूँज | Echo |
| कूपे अकूर्दत् | कुएँ में कूद पड़ा | Jumped into the well |
💡 कथायाः शिक्षा (Moral of the Story)
"बुद्धिर्यस्य बलं तस्य" अर्थात् जिसके पास बुद्धि है, उसी के पास वास्तविक बल है। बुद्धि और विवेक के प्रयोग से बड़ी से बड़ी विपत्ति पर भी विजय पाई जा सकती है।
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